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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

लोया १५

काँच की प्रतिमा एवं गाय के दृष्टांत से आत्मदर्शन

संवत् १८७७ में मार्गशीर्ष कृष्णा त्रयोदशी (२ जनवरी, १८२१) को रात्रि के समय श्रीजीमहाराज श्रीलोया ग्राम-स्थित भक्त सुराखाचर के राजभवन में विराजमान थे। उन्होंने सिर पर श्वेत फेंटा बाँधा था, दूसरा सफ़ेद फेंटा सिर से लेकर आकंठ लपेटा था, गरम पोस की लाल बगलबंडी पहनी थी, श्वेत धोती धारण की थी तथा सफ़ेद सूती शाल और श्वेत पिछौरी एक साथ मिलाकर ओढ़े हुए थे। उनके समक्ष सभा में विभिन्न प्रान्तों के हरिभक्तों तथा परमहंसों की सभा हो रही थी।

तब श्रीजीमहाराज कृपा करके बोले कि, “यह जीव अध्यात्म, अधिभूत तथा अधिदेव-भाव से समस्त देह में नखशिखापर्यन्त व्याप्त होकर रहा है। और, देवता तथा इन्द्रिय द्वारा जीव का भोक्ताभाव रहता है, परन्तु देवता तथा इन्द्रियों से पृथक् होकर भोक्ता नहीं है।”

इस पर नित्यानन्द स्वामी ने शंका प्रकट की कि, “हे महाराज! ऐसा कहा जाता है कि जीव सामान्यतः समस्त देह में व्याप्त होकर भी विशेषरूप से हृदयाकाश में रहता है, तब शरीर के सभी भागों में जीव की ज्ञातृत्व शक्ति समान रूप से अनुभूत नहीं होती, इसका क्या कारण है?”

तब श्रीजीमहाराज बोले, “जैसे सूर्य किरणों द्वारा समस्त पदार्थों में व्याप्त होकर रहा है। फिर भी सामने जैसा पदार्थ रहता है, वहाँ सूर्य का प्रकाश भी वैसा ही दिखायी पड़ता है। वह कैसे तो जैसे काँच जडित भूमि तथा स्वच्छ निर्मल जल में सूर्य का शुद्ध प्रकाश दीख पड़ता है, किन्तु पथरीली और रेतीवाली जमीन तथा गंदे पानी में ऐसा स्पष्ट नहीं दिखाई देता, इस तरह सूर्य के प्रकाश में न्यूनता एवं अधिकता रहती है, वैसे ही यह जीव इन्द्रियों, अन्तःकरण तथा गोलक में समान भाव से रहता है, किन्तु इन्द्रियों में अधिक स्वच्छता रहने के कारण वहाँ विशेष प्रकाश दिखाई पड़ता है। देखिए न! नेत्रों में जितना तेज ज्ञात होता है, उतना क्या नाक-कान में कभी दिखाई पड़ेगा? नहीं दिखेगा। और चार अन्तःकरणों की अतिस्वच्छता होने से, वहाँ जीव का अधिक प्रकाश मालूम होता है तथा अन्य इन्द्रियों में वह न्यून प्रतीत होता है। परन्तु, जीव तो समस्त देह में समान भाव से रहता है।”

तब ब्रह्मानन्द स्वामी ने पूछा कि, “इस जीव को कुछ लोग तो तारासदृश देखते हैं, कुछ दीपक की ज्योति जैसा देखते हैं। तथा कोई तीली के प्रकाश के समान प्रकाशवान देखते हैं, उसे किस प्रकार समझना चाहिए?”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “जिसे अक्षिविद्या सिद्ध है, उसे नेत्र द्वारा जीव का दर्शन होता है और उस जीव में वह भगवान की मूर्ति भी देखता है। वैसे ही जिसे इन्द्रिय द्वारा लक्ष्य हुआ हो, वह वैसी आत्मा को देखता है। जैसे काँच का कोई पुतला मनुष्याकार बनाया हो, उसके सब अवयव, रोम तथा नाड़ियाँ इत्यादि काँच के हों और पुतले के भीतर तेज भरा हो, तब वह सभी तेज रूप ही दीख पड़ेगा, वह भी नली का अवकाश अनुसार ही दिखता है, परन्तु वह समग्र रूप से नहीं दिखाई पड़ता। वैसे ही जिन्होंने उस जीव का जैसा स्वरूप देखा है, वैसा ही वे उसे बताते हैं। परन्तु, उनकी निरावरणदृष्टि नहीं हुई है। इसलिए उन्हें वह आत्मा यथावत् नहीं दिखाई पड़ती। और, जब उनकी निरावरण-दृष्टि होकर आत्माकार हो जाती है, तब इन्द्रियों के गोलक के विभाग उन्हें दृष्टिगोचर नहीं होते। तब जैसी आत्मा होती है वैसी यथार्थरूप से दिखाई पड़ती है।

“जैसे, कोई आकाश की दृष्टि को प्राप्त हुआ हो, उसकी दृष्टि में अन्य चार भूत नहीं आते। वैसे ही जिसकी निरावरण-दृष्टि होती है, उसको गोलक, इन्द्रियों, देवता तथा अन्तःकरण द्वारा जीव के प्रकाश के जो भेद होते हैं, वे भेद दृष्टिगोचर नहीं होते। और जैसा जीव होता है, वैसा ही वह सम्यक् रूप से यथार्थ दिखाई पड़ता है। किन्तु भेद-दृष्टिवाले को वह यथार्थतः नहीं दिखाई पड़ता। जैसे किसी ने गाय की पूँछ देखी और किसी ने उसका मुख देखा, खुर देखा, पेट देखा, और स्तन देखा, इस तरह उसने जो-जो अंग देखे, वह सभी गाय के ही देखे, परन्तु जैसी गाय है, वैसी किसी के दृष्टि-गोचर नहीं हुई। फिर भी एक-एक अंग को देखने से गाय को देखा है, ऐसा भी कहा जाएगा। ठीक वैसे जिसको आत्मा के प्रकाश का जितना दर्शन इन्द्रियों अथवा अन्तःकरण द्वारा हुआ हो, उतना ही वह आत्मदर्शी कहलाता है, परन्तु उसे सम्यक् आत्मदर्शन नहीं कहा जा सकता। अतः हम तो उस जीव में इस प्रकार से सामान्यता या विशेषता मानते हैं।”

तब नित्यानन्द स्वामी ने प्रश्न पूछा कि, “हे महाराज! आप जीव को निराकार बताते हैं, तब उस जीव में भगवान भी अलिंग भाव से रहते हैं या मूर्तिमान होकर रहते हैं?”

तब श्रीजीमहाराज बोले, “भगवान तो इन्द्रियों, देवता, अन्तःकरण तथा जीव इन सभी के आश्रय-भाव से जीव में रहते हैं। जैसे श्रीकृष्ण भगवान ने उद्धव द्वारा गोपियों से कहलाया था कि, ‘इन्द्रियों, अन्तःकरण, देवता तथा जीव के आश्रयभाव से मैं तुम सबके समीप रहा हूँ। जैसे ब्रह्मांड में रहनेवाले में रहा पंचमहाभूत सबकी देहों में रहे हैं, ठीक उसी तरह मैं जो इस मथुरा हूँ, वह तो जिस प्रकार महाभूत विशेषरूप से ब्रह्मांड में रहते हैं उसी प्रकार रहा हूँ। तथा जैसे ये पंचभूत जीवों के शरीरों में सामान्य रूप से रहते हैं, वैसे ही मैं तुम्हारे पास रहा हूँ। और जो मैं आपके दृष्टिगोचर नहीं होता, वह तो तुम सबकी चित्तवृत्ति का निरोध मेरे स्वरूप में हो जाए, इसलिए मैं नहीं दिखता हूँ, परन्तु रहता तो मैं मूर्तिमान ही हूँ।’”

फिर नित्यानन्द स्वामी ने पुनः पूछा कि, “हे महाराज! वे भगवान इन्द्रियादि के आश्रयरूप में तो रहते हैं, परन्तु वे पुरुषरूप में रहते हैं, कि अक्षररूप में रहते हैं कि स्वयं पुरुषोत्तमरूप में रहते हैं?”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “जीव, पुरुष, अक्षर तथा पुरुषोत्तम चारों के तेज प्रकाशभाव से तो सजातीय हैं, अतः उनके प्रकाश के भेद करने में कोई भी समर्थ नहीं है। तथापि, भेद तो अतिशय है, फिर भी उस भेद को देखने के लिए कोई भी समर्थ नहीं हो पाता। और, जिस पर ये भगवान कृपा करते हैं, उसके फलस्वरूप उसकी ऐसी प्रकाशमय दिव्य देह तैयार होती है। तत्पश्चात् वह यह समझ लेता है कि, ‘यह मैं हूँ, यह पुरुष है तथा यह अक्षर है और इन सबसे विलक्षण ये पुरुषोत्तम हैं।’ इस प्रकार यह जीव सबको पृथक् रूप से देखता है तथा इनके प्रकाश को भी विलक्षण रूप से देखता है। अन्य कोई भी उस प्रकाश को पृथक्‌रूप से देखने में समर्थ नहीं होता। अतएव, ये भगवान चाहे जिस रूप में रहते हैं, परन्तु वे स्वयमेव रहते हैं।

“और, वेदान्त यानी उपनिषद् तथा योग तथा सांख्य ये तीनों शास्त्र सनातन हैं और ये श्रीकृष्ण परमात्मा का ही वर्णन करते हैं। इन तीनों शास्त्रों का मत हम आपके सामने पृथक् रूप से बताते हैं, उसे सुनिये।

“उनमें सांख्यशास्त्र चौबीस तत्त्वों को कहकर उनसे परे पचीसवें तत्त्व को परमात्मा बताता है, परन्तु वह जीव तथा ईश्वर को पृथक् करके नहीं कहता। उसका यह अभिप्राय है कि इन तत्त्वों का अस्तित्व जीव के बिना संभव नहीं रहता, अतः तत्त्वों के साथ तदात्मकभाव से रहनेवाले जीव को तत्त्वरूप ही कहता है, किन्तु तत्त्वों से पृथक् नहीं कहता है। जैसे जीव को चौबीस तत्त्वरूप माना जाता है, वैसे ही ब्रह्मांडाभिमानी ईश्वर को भी सांख्यमतवाले चौबीस तत्त्वरूप मानते हैं। इस प्रकार जीव एवं ईश्वर दोनों को तत्त्वरूप मानकर तत्त्वों के अन्तर्गत ही उनकी गणना करते हैं, परन्तु उन्हें तत्त्वों से पृथक् नहीं गिनते तथा पचीसवें तत्त्व को परमात्मा कहते हैं। यह सांख्यशास्त्र का मत है। परन्तु यह नहीं समझना चाहिए कि जीव नहीं है, क्योंकि सांख्यशास्त्र षट्सम्पत्ति,१८६ श्रवण, मनन तथा निदिध्यास आदि साधन बताता है, वे साधन जीव को ही करने हैं। उन साधनों द्वारा जीव विचार को प्राप्त होता है तथा उस विचार द्वारा वह स्वयं को तत्त्वों से अलग करके अपने को ब्रह्मरूप मान लेता है और परमात्मा का भजन करता है, ऐसा सांख्यमत है। मोक्षधर्म में नारदजी ने शुकजी से कहा है:

‘त्यज धर्ममधर्मं च उभे सत्यानृते त्यज।
उभे सत्यानृते त्यक्त्वा येन त्यजसि तत्त्यज ॥’१८७

“इस श्लोक का अर्थ है कि, ‘जब मुमुक्षु आत्मविचार करने बैठे, तब उसके मार्ग में धर्मरूप अथवा अधर्मरूप तथा सत्यरूप एवं असत्यरूप जो-जो संकल्प-विकल्प हों, उनका त्याग करके, जिस विचार द्वारा उसका त्याग होता है उस विचार का भी परित्याग करके ब्रह्मरूप होकर रहना चाहिए, किन्तु देह से धर्मरूप नियम का त्याग करने का आदेश नहीं दिया गया है।’

“योगशास्त्र चौबीस तत्त्वों की गणना के बाद जीव एवं ईश्वर को पचीसवाँ तत्त्व मानता है तथा परमात्मा को छब्बीसवाँ तत्त्व बताता है। योगमतावलंबी इस प्रकार, विवेकज्ञान से पचीसवें तत्त्व को अन्य तत्त्वों से पृथक् समझकर और आत्मा के साथ एकात्मता की दृढ़ता मानकर चौबीस तत्त्वों की वृत्तियों का पिंडीभाव करके उन्हें बलपूर्वक छब्बीसवें तत्त्व - परमात्मा में रखते हैं, परन्तु विषयोन्मुख नहीं होने देते, और ऐसा समझते हैं कि, ‘यदि मेरी वृत्ति भगवान को छोड़कर अन्य स्थान पर जाएगी, तो मुझे संसृति प्राप्त होगी।’ अतएव, अत्यन्त आग्रह करके वह इन्द्रियों तथा अन्तःकरण की वृत्तियों को भगवान के श्रीचरणों में तन्मय कर देते हैं।

“सांख्यमतावलम्बी का तो यह मन्तव्य है कि, ‘मेरी इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण हैं ही नहीं! तो ये सब अन्यत्र वृत्ति लगायेंगे ही कहाँ?’ इसलिए, वह स्वयं को ब्रह्मरूप मानकर निर्भय रहता है। परंतु योगमतानुयायी तो डरता ही रहता है। जैसे किसी पुरुष के हाथ में तेलपूरित पात्र पूर्ण भरा हुआ हो और उसे सीढ़ियों द्वारा ऊँचा चढ़ना हो, उस समय यदि दोनों ओर से खुली तलवारवाले आदमी तेलपात्र में से तेल की एक भी बूँद के नीचे गिरने पर उसका शिरच्छेद करने के लिए साथ में रहें, तो वह इस डर के कारण सावधान रहता है तथा तेल को उस पात्र में से छलकने नहीं देता। इसी प्रकार योगमतानुयायी भी विषयों से डरकर भगवान में अपनी वृत्तियों को बनाये रखता है। यह योगशास्त्र का मत है। तथा वेदान्त यानी उपनिषद् का मत यह है कि वह पुरुषोत्तम नारायण ब्रह्म को ही सबका कारण मानता है और अन्य सभी को मिथ्या समझता है। जैसे आकाश की दृष्टि को प्राप्त पुरुष अन्य तत्त्वों को नहीं देखता, वैसे ही उस ब्रह्म को देखनेवाला भी अन्य किसी को नहीं देखता। वेदान्त का यही मत है।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ १५ ॥ १२३ ॥

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This Vachanamrut took place ago.


१८६. शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान तथा श्रद्धा, ये अद्वैत वेदान्त में प्रसिद्ध ‘षट् संपत्ति’ हैं।

१८७. महाभारत, शांतिपर्व: ३१६/४०, ३१८/४४

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