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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा मध्य १४

निर्विकल्प समाधि

संवत् १८७८ में भाद्रपद शुक्ला प्रतिपदा (२८ अगस्त, १८२१) को स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन में श्रीवासुदेव नारायण के मन्दिर के समीप उत्तरी द्वार के कमरे के बरामदे में विराजमान थे। उन्होंने श्वेत धोती धारण की थी, सफ़ेद चादर ओढ़ी थी, मस्तक पर श्वेत फेंटा बाँधा था, उस फेंटे के ऊपर लाल कर्णिकार पुष्प का तुर्रा सुशोभित लग रहा था। उनके भाल में कुंकुम का सुन्दर टीका लगा हुआ था। उनके समक्ष मुनिमंडल तथा विभिन्न प्रान्तों के हरिभक्तों की सभा हो रही थी।

उस समय मुक्तानन्द स्वामी ने पूछा कि, “भगवान के स्वरूप में जो सन्त तदात्मक भाव को प्राप्त हो जाते हैं, वे समाधि द्वारा होते हैं या उसका कोई अन्य उपाय भी है?”

तब श्रीजीमहाराज ने कहा कि, “कल हमने जैसी भगवान के स्वरूप की बातें कही थीं, उस प्रकार उस भगवत्स्वरूप को यथार्थरूप में जान लिया हो और उनके निश्चय में किसी तरह का संशय न रह गया हो, वही भगवान के स्वरूप में तदात्मक भाव है। जैसे नीमवृक्ष के सम्बंध में एक बार जान लिया, तो मन में किसी प्रकार का संशय ही नहीं होता कि, ‘यह पेड़ नीम का है या नहीं?’ इसी प्रकार, चाहे किसी का भी संग हो जाए और चाहे कैसे ही शास्त्रों का श्रवण किया जाए, किन्तु फिर भी जिसका मन भगवान के स्वरूप के सम्बंध में किए गए निश्चय से विचलित नहीं होता, ऐसे भगवत्सम्बंधी निरुत्थान निश्चय को ही हम तदात्मकता कहते हैं। ऐसी तदात्मकता केवल एकान्तिक भक्त के प्रसंग से ही सिद्ध होती है; किन्तु केवल समाधि से सिद्ध नहीं होती। ऐसी तदात्मकता को ही निर्विकल्प समाधि कहते हैं। जिसे इस प्रकार की निर्विकल्प समाधि हो गई हो, ऐसे सन्त भी निर्गुण ब्रह्म ही हैं।

“ऐसे अडिग निश्चयवाले सन्त भले ही निवृत्ति-मार्ग पर चलें अथवा प्रवृत्ति मार्ग पर, परन्तु वे सर्वदा निर्गुण ही हैं। जैसे नारद एवं सनकादिक ऋषि निवृत्तिमार्ग की ओर प्रवृत्त हुए तथा सप्त ऋषि और जनकादि राजा प्रवृत्तिमार्ग पर चले, फिर भी भगवान सम्बंधी निश्चय की दृढ़ता के कारण उन्हें भी निर्गुण जानना चाहिए। यदि कोई निवृत्ति-मार्गी हो, परन्तु उसे भगवान सम्बंधी निश्चय नहीं है, तो उसे मायिक गुणयुक्त होने के कारण सगुण ही समझना चाहिए और उसके बारे में यह समझना कि, ‘यद्यपि वह अतिशय त्यागी दिखता है, फिर भी उसे भगवान सम्बंधी निश्चय नहीं है; अतः वह अज्ञानी है और वह निश्चित ही नरक में जाएगा।’ और, जिसको भगवान के स्वरूप का ऐसा अविचल निश्चय है, फिर यदि उसमें कोई कमी रह गई होगी, तो भी उसकी असद्‌गति कभी नहीं होगी, वह तो अवश्य ही निर्गुणभाव को प्राप्त कर लेगा। और, जिसे भगवान के स्वरूप का तो ऐसा निश्चय नहीं है, फिर वह चाहे कितना ही उच्च त्यागी हो और काम, क्रोध, लोभादि को टालने में पूरी सावधानी भी बरतता हो, परन्तु उसके मिटाए वे कामादिक विकार नहीं मिटेंगे, किन्तु अन्त में वह दुर्दशाग्रस्त होकर नरक में ही जाएगा। और, जिसको भगवान के स्वरूप का ऐसा ज्ञान हो चुका है, उसकी बुद्धि अल्प होने पर भी उसे महाबुद्धिमान समझना चाहिए; किन्तु, जिसे भगवान के स्वरूप का ऐसा ज्ञान नहीं हो पाया, उसे अधिक बुद्धि होने पर भी बुद्धिहीन ही समझना चाहिए।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ १४ ॥ १४७ ॥

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