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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा मध्य १६

स्वरूपनिष्ठा एवं धर्मनिष्ठा

संवत् १८७८ में भाद्रपद शुक्ला दशमी (७ सितम्बर, १८२१) को स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन में श्रीवासुदेव नारायण के मन्दिर के समीप चौकी पर विराजमान थे। उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किए थे। उनके समक्ष मुनिमंडल तथा विभिन्न प्रान्तों के हरिभक्तों की सभा हो रही थी।

उस समय मुक्तानन्द स्वामी ने प्रश्न किया कि, “एक ओर अर्जुन की तरह स्वरूपनिष्ठा है, तो दूसरी ओर राजा युधिष्ठिर की तरह धर्मनिष्ठा है। इन दोनों प्रकार की निष्ठाओं में से यदि कोई स्वरूपनिष्ठा का बल रखता है, तो उसकी धर्मनिष्ठा शिथिल हो जाती है और यदि धर्मनिष्ठा का बल रखता है, तो उसकी स्वरूपनिष्ठा मन्द पड़ जाती है। इसलिए, ऐसा कौन-सा उपाय किया जाना चाहिए, जिससे कि इन दोनों निष्ठाओं में से कोई भी निष्ठा शिथिल न पड़ सके?”

तब श्रीजीमहाराज ने कहा कि, “श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध में पृथ्वी और धर्म का जो संवाद है, उसमें यह बताया गया है कि: ‘भगवान का स्वरूप सत्य, शुचिता आदि उनचालीस गुणों से युक्त है।’ अतः समस्त धर्म भगवान की मूर्ति पर आधारित रहते हैं। इसलिए ही भगवान को धर्मधुरन्धर कहा गया है और श्रीमद्भागवत के उसी स्कन्ध में शौनकादि ऋषियों ने सूत पुराणी से पूछा है कि, ‘धर्म के कवचस्वरूप श्रीकृष्ण भगवान के अन्तर्धान होने के पश्चात् धर्म किसकी शरण में रहा था?’ उसका तात्पर्य यही है कि धर्म भगवान के आश्रय में ही रहता है। इसलिए, जो मुमुक्षु भगवान की निष्ठा रखता है, उसके हृदय में भगवान का स्वरूप भी बना रहता है। इस प्रकार, उसके हृदय में धर्म भी निवास करके रहता है। अतः जो भक्त स्वरूपनिष्ठा रखता है, उसकी धर्मनिष्ठा भी सहजभाव से बनी रहती है। परन्तु यदि उसने एकमात्र धर्मनिष्ठा ही रखी, तो स्वरूपनिष्ठा अवश्य शिथिल पड़ जाएगी। इस कारण बुद्धिमान मुमुक्षु स्वरूपनिष्ठा ही दृढ़ करके रखें, ताकि उसके साथ-साथ धर्मनिष्ठा भी सुदृढ़ बनी रहे।”

इसके पश्चात् मुक्तानन्द स्वामी ने दूसरा प्रश्न पूछा कि, “पंचविषयों की आसक्ति को वैराग्य द्वारा जीता जाता है या कोई अन्य उपाय भी है?”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “वैराग्य हो अथवा न हो, परन्तु परमेश्वर द्वारा बताए गए नियमों का यदि सावधानी से पालन किया जाए, तो पंचविषयों की आसक्ति पर विजय प्राप्त की जा सकती है। यदि शब्द से वैराग्य द्वारा वृत्ति को लौटाया जाए, तो भारी प्रयास करने पर भी शब्द सुनाई देता है, लेकिन कानों को ही बन्द कर लिया जाए, तो सहज ढंग से शब्द नहीं सुना जा सकता। उसी प्रकार, यदि अनुचित पदार्थ या व्यक्ति का त्वचा से स्पर्श न किया जाए, तो सहज स्पर्श को जीता जा सकता है। वैसे ही अनुचित वस्तु या व्यक्ति को नेत्रों से न देखा जाए, तो सहज ही रूप को जीत लिया जा सकता है। इसी प्रकार, स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में पानी मिलाकर खाया जाए तथा उपयुक्त आहार किया जाए, तो सहजभाव से रसना पर विजय प्राप्त कर ली जाती है। वैसे ही अनुचित गन्ध को न सूँघने अथवा नासिका को बन्द कर लेने से सहज ही गन्ध को जीत लिया जाता है। इस प्रकार इन्द्रियों पर नियमों की लगाम कसने से पंचविषयों की आसक्ति को जीत लिया जाता है। यदि नियमों का पालन न करे, तो चाहे वह उत्कृष्ट वैराग्यवान एवं ज्ञानी मुमुक्षु ही क्यों न हो, वह अवश्य पथभ्रष्ट हो जाएगा। अतः विषयों की आसक्ति पर विजय पाने के लिए तो परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित नियम ही एकमात्र उपाय है। उसमें भी मन्द वैराग्यवालों के लिए तो नियमबद्ध रहना ही उबरने का श्रेष्ठ मार्ग है, ठीक उसी प्रकार, जैसे कि बीमार व्यक्ति परहेज़ करते हुए औषध-सेवन करने से रोगमुक्त हो जाता है।”

यह सुनकर अखंडानन्द स्वामी ने पूछा कि, “रोगी मनुष्य को परहेज रखने के लिए नियम होता है कि इतने दिन तक परहेज़ रखा जाए, वैसे ही कल्याण की साधना का भी कोई नियम (कोई समयमर्यादा) है या नहीं?”

तब श्रीजीमहाराज ने कहा कि, “जिसकी श्रद्धा मन्द होती है, उसकी साधना की समाप्ति अनेक जन्मों के बाद होती है। जैसे भगवद्‌गीता में कहा भी है:

‘अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्।’२३४

“अर्थात् ‘अनेक जन्मों द्वारा संसिद्ध हुआ योगी परमपद को प्राप्त करता है।’ यह पक्ष मन्द श्रद्धावानों का बताया गया है, किन्तु जिसकी श्रद्धा बलवती होती है, वह तो तत्काल सिद्ध हो जाता है। यह बात भी गीता में कही गयी है:

‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥’२३५

“अर्थात् ‘जिसकी इन्द्रियाँ नियमानुकूल हैं, ऐसे श्रद्धावान पुरुष को ही ज्ञान प्राप्त होता है तथा ज्ञान प्राप्त करके वह तुरन्त ही परमपद को प्राप्त कर लेता है।’ अतः जो अतिशय श्रद्धावान होता है, उसकी साधना की समाप्ति शीघ्र ही हो जाती है। किन्तु मन्द श्रद्धावान की साधना की समाप्ति तो अनेक जन्मों के बाद ही होती है। जैसे कोई पुरुष काशी जा रहा हो और वह पूरे दिन में केवल दो कदम ही चल पाता हो, तो उसे काशी पहुँचने में बहुत दिन लग जाएँगे! जबकि कोई दिनभर में बीस-बीस कोस चलने लगता है, वह तो कुछ ही दिनों में काशी पहुँच जाएगा। वैसे ही जिसकी श्रद्धा बलवती होती है, वह चाहे क्यों न अभी-अभी तुरन्त सत्संगी हुआ हो, परन्तु वह अतिशय श्रेष्ठ हो जाता है और मन्द श्रद्धावाला तो दीर्घकाल से सत्संगी होने पर भी शिथिल ही रह जाता है।”

इसके पश्चात् श्रीगुरुचरणरतानन्द स्वामी ने पूछा कि, “जब मन्द श्रद्धावान भक्त का अनेक जन्मों के पश्चात् कल्याण होता है, तब देहत्याग के बाद वह कहाँ रहता होगा?”

तब श्रीजीमहाराज ने कहा कि, “ऐसा साधक सुन्दर देवलोक में जाकर रहता है। जब वह भक्त भगवान का ध्यान करते समय भगवान के सामने देखता था, उस समय भगवान भी उसके सामने देखते थे। वह भक्त भगवान का ध्यान करते समय जिन-जिन विषयों का चिन्तन किया करता था तथा जिन-जिन विषयों में उसे अनुराग था, उन सबको भगवान ने दृष्टिगत रखा था, अतः उसके देहत्याग के बाद भगवान उस भक्त को उसके प्रिय भोग भोगने के लिए, जहाँ ऐसे भोग हैं उस लोक में पहुँचाते हैं और काल को भी आज्ञा करते हैं कि, ‘तुम इस भक्त के भोगों में रुकावट मत डालना।’ इसीलिए, वह भक्त निरन्तर देवलोक में रहता हुआ, भोगों को भोगता रहता है और इसके पश्चात् मृत्युलोक में आकर अनेक जन्मों के बाद मोक्ष को प्राप्त करता है।”

इसके पश्चात् अखंडानन्द स्वामी ने प्रश्न पूछा कि, “तीव्र श्रद्धावान् पुरुष के लक्षण कैसे होते हैं?”

यह सुनकर श्रीजीमहाराज बोले कि, “जिसे तीव्र श्रद्धा होती है, वह भगवान के दर्शन के लिए अथवा भगवत्कथावार्ता सुनने के लिए एवं भगवान की मानसी पूजा आदि भगवान सम्बंधी समस्त क्रियाओं को सम्पन्न करने के लिए अपनी स्नानादि दैहिक क्रिया को बड़ी शीघ्रता से निपटा लेता है। और, यदि हमने पत्र लिखकर कोई नवीन व्रत-नियम के पालन का आदेश दिया हो, तो उसी प्रकार नियम-पालन करने के लिए भी वह बालक की तरह व्याकुल हो उठता है। जिसमें ऐसे लक्षण हों, उसे तीव्र श्रद्धावान समझना चाहिए। ऐसा श्रद्धावान् मुमुक्षु अपनी समस्त इन्द्रियों को तत्काल वश में कर लेता है। और, मन्द श्रद्धावान् की इन्द्रियाँ अत्यन्त तीक्ष्ण रूप से विषयोन्मुख होकर उनमें संलग्न हो जाती हैं। वह अपनी विषयासक्ति को चाहे कितना ही गोपनीय रखने का प्रयास करे, फिर भी सबको उसकी जानकारी हो जाती है कि, ‘इसकी इन्द्रियों का वेग तीक्ष्ण रूप से विषयोन्मुख ही है।’ इन्द्रियों का स्वरूप तो वायु के वेग जैसा है। भले ही वायु दिखाई नहीं पड़ता, परन्तु वृक्षों के कम्पन से पता चलता है कि हवा चल रही है, वैसे ही इन्द्रियों की वृत्तियाँ यद्यपि दिखाई नहीं पड़तीं, किन्तु वे विषयोन्मुख दौड़ती हैं, उनकी जानकारी सभी को हो जाती है। उस समय यदि कोई पुरुष कपटपूर्वक इस बात को छिपाने की कोशिश करता है, तो लोगों की दृष्टि में वह घृणित हो जाता है। इसलिए, यह स्पष्ट है कि जिसकी इन्द्रियों में विषयभोग की तीक्ष्णता होगी, वह किसी प्रकार से गुप्त नहीं रह सकती।”

अब मुक्तानन्द स्वामी ने प्रश्न पूछा कि, “विषयों की ओर इन्द्रियों के तीक्ष्ण वेग को मिटाने का क्या उपाय है?”

श्रीजीमहाराज बोले कि, “इन्द्रियों की तीक्ष्ण विषयोन्मुखता को मिटाने का यही उपाय है कि परमेश्वर ने त्यागी तथा गृहस्थों के लिए जिन नियमों का प्रतिपादन किया है, उनके अनुसार यदि सभी इन्द्रियों पर बलपूर्वक अंकुश रखा जाए, तो सहज ही इन्द्रियों की तीक्ष्णता मिट सकती है। जब श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना तथा घ्राणेन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को यदि कुमार्ग पर नहीं जाने दिया जाए, तो इन्द्रियों के आहार शुद्ध हो जाते हैं और बाद में अन्तःकरण भी शुद्ध हो जाता है। अतः वैराग्य का बल हो या न हो, तो भी यदि इन्द्रियों को वश में करके परमेश्वर के बताए गए नियमों में रखा जाए, तो जैसे तीव्र वैराग्य द्वारा विषय जीते जाते हैं, उससे भी नियम पालन करनेवाला विशेष रूप से विषयों पर विजय प्राप्त कर सकता है। अतः परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित नियमों को ही अत्यन्त दृढ़ करके रखें।”

तब अखंडानन्द स्वामी ने पुनः पूछा कि, “जिस पुरुष को मन्द श्रद्धा हो, उसकी श्रद्धा तीव्र कैसे बन सकती है?”

इसका उत्तर देते हुए श्रीजीमहाराज बोले कि, “यदि भगवान का माहात्म्य जान लिया जाए, तो मन्द श्रद्धा भी तीव्र हो सकती है। जैसे पानी पीने का मिट्टी का पात्र हो, तो उसमें स्वाभाविक ही उतनी रुचि नहीं रहेगी, जितनी की सहज ही स्वर्णपात्र में रुचि रहती है! वैसे ही भगवान की तथा भगवत्कथा-कीर्तनादि की महिमा समझ ली, तो भगवान तथा उनके कथा-कीर्तनादि में सहज ही श्रद्धा में वृद्धि होगी। इसलिए, वही उपाय करना चाहिए, जिससे भगवान का माहात्म्य समझ में आ जाए। यदि ऐसा उपाय किया जाए, तो श्रद्धा नहीं होने पर भी श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है और मन्द श्रद्धा भी तीव्र श्रद्धा में बदल जाती है।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ १६ ॥ १४९ ॥

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२३४. अर्थ के लिए देखिए वचनामृत गढ़डा प्रथम १५ की पादटीप।

२३५. गीता: ४/३९

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