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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा मध्य ५२

त्यागी और गृहस्थ

संवत् १८८० में चैत्र कृष्णा एकादशी (२५ अप्रैल, १८२४) को श्रीजीमहाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन से घोड़ी पर सवार होकर श्रीलक्ष्मीवाड़ी में पधारे थे और वहाँ वेदी पर विराजमान हुए थे। उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किए थे, कंठ में पुष्पों का हार पहना था और पाग में फूलों का तुर्रा लगा हुआ था। उनके समक्ष मुनियों तथा विभिन्न प्रान्तों के हरिभक्तों की सभा हो रही थी। तथा मुनिमंडल झाँझ-मृदंग लेकर कीर्तनगान कर रहे थे।

जब सभी मुनि कीर्तन कर चुके, तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “लीजिए, अब वार्ता करते हैं और उसे सुनिए। इस संसार में गृहस्थाश्रमी तथा त्यागी में ये दोनों के मार्ग भिन्न-भिन्न हैं। जो वस्तु गृहस्थ को शोभारूप होती है, वही त्यागी के लिए दूषणरूप हो जाती है; और जो त्यागी को शोभारूप होती है, वही गृहस्थ के लिए दूषणरूप हो जाती है। जो बुद्धिमान होता है वह इस रहस्य को जान पाता है, अन्य मनुष्य को इसका ज्ञान नहीं होता। अब इस बात को विस्तारपूर्वक बताते हैं।

“जो गृहस्थाश्रमी है, उसके लिए तो धन, दौलत, हाथी, घोड़ा, गाय, भैंस, कोठी, हवेली, स्त्री, पुत्र, मूल्यवान वस्त्र तथा आभूषण ये सभी वस्तुएँ शोभारूप होती हैं, जबकि ये सभी वस्तुएँ त्यागी के लिए दोषरूप बन जाती हैं। त्यागी को वन में रहना, बिना वस्त्र के एक कौपीनमात्र पहनकर खुले शरीर रहना, या सिर पर पाघ धारण करना, दाढ़ी-मूँछ मुँड़वाना, भगवे वस्त्र पहनना और किसी के भी द्वारा दी गई गालियों और डाली गई धूल जैसे अपमान को सहन करना, ये ही त्यागी के लिए परम शोभारूप हैं। त्यागी की यही शोभा गृहस्थ के लिए परम दोषरूप बन जाती है। इसलिए, संसार से विरक्त होकर निकले हुए त्यागी पुरुष को यह विचार करना चाहिए कि, ‘मैं कौन-से आश्रम में हूँ,’ इस प्रकार बुद्धिमान को विचार करना चाहिए। किन्तु मूर्ख की तरह बिना विचार किए किसी की नकल करने के रास्ते पर ढलते नहीं जाना।

“तो वह और, जो विवेकशील है, उसे यदि कोई डाँट-फटकारकर भी उसके हित की सलाह देता है, तो वह उसका गुण ही ग्रहण करता है, किन्तु मूर्ख को अगर कोई हितकारी बात भी करता है, तो वह परेशान हो जाता है। देखिए, ये मुकुन्द ब्रह्मचारी तथा रतनजी कभी उलझन में नहीं पड़ते। अतः उनके साथ हमारी खूब पटती है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक सेवा-चाकरी करता है, वह हमें प्रिय लगता है। यदि कोई भक्त बिना श्रद्धा के कोई भोजन लाए, हमें प्रिय नहीं लगता; और कोई वस्त्र लाए, तो ऐसे वस्त्र को धारण करना हमें प्रिय नहीं लगता; और यदि कोई बिना श्रद्धा के पूजा सामग्री लाता है, तो वह भी हमें प्रिय नहीं लगता। परन्तु श्रद्धापूर्वक जो सेवा किया करता है, वह हमें अतिशय प्रिय लगता है। और, यदि कोई भक्त श्रद्धापूर्वक भक्ति करता हो और इस बीच अगर कोई अन्य भक्त भक्ति करने आये, उस पर यदि वह ईर्ष्या करे, तो वह हमें प्रिय नहीं लगता। अतः जो श्रद्धा सहित एवं ईर्ष्या रहित होकर भक्ति करता है, वह हमें अतिशय प्रिय लगता है।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ ५२ ॥ १८५ ॥

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