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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा मध्य ६७

स्वामी-सेवकभाव

संवत् १८८१ में माघ कृष्णा तृतीया (६ फरवरी, १८२५) को स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन में अपने निवासस्थान पर गंगाजलिए कुएँ के पास चबूतरे पर रखे हुए पलंग पर गद्दी-तकिया रखवाकर विराजमान थे। उन्होंने सभी श्वेत वस्त्र धारण किए थे। उनके समक्ष मुनियों तथा विभिन्न प्रान्तों के हरिभक्तों की सभा हो रही थी।

उस समय श्रीजीमहाराज के समक्ष साधु दुक्कड़-सरोद लेकर विष्णुपद गा रहे थे। कीर्तन-भक्ति की समाप्ति के पश्चात् श्रीजीमहाराज बोले कि, “सभी सन्तों से हम यह प्रश्न पूछते हैं कि जब भगवान का भक्त देहोत्सर्ग करने के पश्चात् ब्रह्मरूप होकर भगवान के धाम में जाता है, तब उसमें तथा भगवान में ऐसा कौन-सा अन्तर रहता है, जिसके कारण स्वामी-सेवकभाव का नाता बना रहता है? क्योंकि जिस प्रकार भगवान स्वतंत्र हैं तथा काल, कर्म एवं माया के आवरणों से रहित हैं, ठीक उसी तरह ही भगवान का यह ब्रह्मरूप भक्त भी वैसा ही हो जाता है। इसलिए, भक्त-भगवान के बीच ऐसा कौन-सा भेद रहता है, जिसके द्वारा स्वामी-सेवकभाव बना रहता है!”

यह सुनकर परमहंसों में जैसा जिसकी समझ में आया, वैसा उसने उत्तर दिया, परन्तु श्रीजीमहाराज के प्रश्न का समाधान न हो सका। तब सभी सन्तों ने यह निवेदन किया कि, “हे महाराज! कृपया आप ही अपने इस प्रश्न का उत्तर दीजिए।”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “इस प्रश्न का उत्तर यह है कि भगवान के जिस भक्त ने भगवान को ऐसा जान लिया हो कि भगवान इतने सामर्थ्य एवं शोभा से युक्त हैं तथा ऐसे आनन्दरूप हैं, इस प्रकार उनका जितना माहात्म्य जान लिया हो तथा भगवान को जितने प्रताप से युक्त समझा हो, वही भक्त जब देहत्याग करके भगवान के धाम में जाता है, तब भक्त का रूप एवं सामर्थ्य भी भगवान सदृश ही हो जाते हैं। फिर भी, उस भक्त को भगवान का सामर्थ्य एवं भगवान की सुन्दरता इत्यादि जो भी प्रताप है, वह उस भक्त को भगवान में अतिशय अधिक ही प्रतीत होता है। तब वह भक्त यह समझने लगता है कि मैंने स्वयं भगवान का जितना प्रताप जान लिया था तथा उनकी जितनी सुन्दरता जानी थी, उतना ऐश्वर्य तथा उतनी सुन्दरता तो भगवान ने मुझे प्रदान की है! फिर भी भगवान का ऐश्वर्य तथा भगवान की सुन्दरता तो अतिशय अपार दिखाई पड़ती है। इसलिए, मेरे जैसे अनेक पुरुष भगवान के साधर्म्य को प्राप्त हो चुके हैं, तथापि कोई भी भक्त भगवान सदृश होने में समर्थ नहीं हो पाता, वह इसलिए कि भगवान की जो महिमा है और भगवान में जैसे गुण, कर्म, जन्म, सामर्थ्य, सौन्दर्य तथा सुखदायीपन आदि अनेक कल्याणकारी गुण विद्यमान हैं, उनका पार पाने में तो शेष, शारदा, ब्रह्मादि देवता तथा चारों वेद भी समर्थ नहीं हो पाते। भगवान स्वयं भी अपनी महिमा का पार नहीं पाते हैं, क्योंकि वे अनन्त हैं। इसलिए वे सभी सामर्थियों में सबसे अपार है।

“और, उन भगवान की भक्ति करके अनन्त कोटि वैष्णवजन भगवान-सदृश हो गए हैं, फिर भी भगवान में से अपना किसी भी प्रकार का प्रताप अणुमात्र भी कम नहीं हुआ है। जैसे मीठे जल का सागर लबालब भरा हुआ हो, उसमें से मनुष्य, पशु, पक्षी सभी अपनी इच्छा के अनुसार पानी पी लेते हैं तथा जल से पात्र भी भर लिए जाते हैं, तो भी उसका पानी कम नहीं होता, क्योंकि समुद्र तो अगाध है, वैसे ही भगवान की महिमा भी अतिशय अपार है, जो किसी भी प्रकार से न्यूनाधिक नहीं होती। इसीलिए, भगवान के जो जो भक्त ब्रह्मस्वरूप हो चुके हैं, वे भी भगवान के दृढ़ सेवक होकर भगवान का भजन करते रहते हैं। इस प्रकार भगवान का वह भक्त भगवान का साधर्म्य प्राप्त करता है, फिर भी उसका स्वामी-सेवकभाव बना ही रहता है।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ ६७ ॥ २०० ॥

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