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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

जेतलपुर ५

जेतलपुर ५

संवत् १८८२ में चैत्र शुक्ला सप्तमी (१४ अप्रैल, १८२६) को स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीजेतलपुर ग्राम-स्थित प्रासाद के दक्षिणवर्ती चौक में उत्तराभिमुख होकर चौकी पर विराजमान थे। उन्होंने सभी श्वेत वस्त्र धारण किए थे, मस्तक पर महीन पोतदार श्वेत पाग धारण की थी, सफ़ेद महीन चादर ओढ़ी थी और श्वेत धोती पहनी थी। उनके समक्ष मुनि तथा विभिन्न प्रान्तों के हरिभक्तों की सभा हो रही थी। उस समय रात्रि को डेढ़ प्रहर बीत चुके थे।

श्रीजीमहाराज थोड़ी देर तक विचार करने के बाद बोले कि, “आप सब सुनिये आज तो हमें यथार्थ रहस्य की बातें करनी हैं कि भगवान को भजना, इसके उपरान्त अन्य कोई बात बड़ी नहीं है। क्योंकि भगवान का किया ही सब कुछ होता है। आज तो भगवान के प्रताप से इस सभा का किया भी सब कुछ होता है। श्रीनरनारायण के प्रताप से हमारा किया भी सब कुछ होता है। वह इस प्रकार है, कि हम मन में जैसा संकल्प करते हैं, वैसा ही इस जगत में प्रवर्तित हो जाता है। हम जैसी धारणा करते हैं वैसा ही यथार्थ रूप से हो जाता है। जब हम यह इच्छा करते हैं कि अमुक मनुष्य को राज्य मिलना चाहिए तब उसे राज्य मिलता है। तथा हम चाहते हैं कि इसका राज्य समाप्त हो जाए, तब ऐसा ही होता है। जब हम धारणा करते हैं कि इस पल में यहाँ इतनी वर्षा हो, तो उतने ही परिमाण में वहाँ वर्षा अवश्य होती है, हम चाहते कि यहाँ वर्षा न हो, तो वहाँ वर्षा नहीं होती। जब हम यह धारणा करते हैं कि अमुक पुरुष को धन प्राप्त हो, तो उसे धन मिल जाता है, तथा हम चाहें कि अमुक पुरुष को धन न मिले, तो उसे नहीं मिल पाता! जब हम यह चाहते हैं कि इसको पुत्र प्राप्त हो, तो उसको पुत्र मिल जाता है और हमारे न चाहने पर अन्य किसी को पुत्र प्राप्ति नहीं होती। जब हम यह चाहते हैं कि इस पुरुष को रोग हो, तो उसे रोग हो जाता है, तथा हमारे चाहने पर अमुक पुरुष को रोग नहीं होता! इस प्रकार हम जैसी धारणा करते हैं, वैसा अवश्य हो जाता है।

“तब आप कहेंगे कि, ‘सत्संगी को सुख-दुःख प्राप्त होते हैं और रोगादि प्राप्त होता है तथा उसकी धनसमृद्धि की कुछ हानि होती है और वह मेहनत करके मर जाता है, तो भी दरिद्र-जैसा ही रहता है। इसका कारण क्या हो सकता है?’ तो इसका कारण यह है कि उसे भगवान को भजने में जितनी कसर रहती है, उतनी ही मात्रा में उसकी स्थिति में वृद्धि नहीं हो पाती। भगवान को तो वस्तुतः उसका कल्याण ही करना है। क्योंकि भगवान अपने आश्रितजनों का सूली का दुःख भी काँटे द्वारा मिटाते हैं।

“और, हम तो ऐसा जानते हैं कि, ‘सत्संगी को एक बिच्छू के काटने से जितनी पीड़ा होती हो, तो हमें वही पीड़ा सहस्रगुना हो जाए। परन्तु उस पीड़ा से वह हरिभक्त मुक्त हो जाए और सुखी रहे।’ ऐसा वरदान हमने रामानन्द स्वामी से माँग लिया है। वास्तव में हमारा दृष्टिकोण यही रहता है कि सबका कल्याण हो। जीव की मनोवृत्ति भगवान में लगाए रखने का उपाय भी हम निरन्तर करते रहते हैं। इसका कारण क्या है? तो हम तो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों की समस्त क्रियाओं को जानते रहते हैं और यहाँ बैठे हुए भी सबको जानते हैं। जब माता के उदर में थे, उस समय भी जानते थे तथा उदर में नहीं आए थे, तब भी यह जानते थे। क्योंकि हम तो भगवान नरनारायण ऋषि हैं।३०४ और, कैसा भी महापापिष्ट जीव होगा, यदि वह हमारा आश्रय करेगा, और धर्म-नियम के पालन में दृढ़ रहेगा, उसे हम अन्तकाल में दर्शन देकर भगवान के अक्षरधाम की प्राप्ति करा देते हैं।

“उस अक्षरधाम के स्वामी श्रीपुरुषोत्तम भगवान सर्व प्रथम धर्मदेव और मूर्तिदेवी द्वारा श्रीनरनारायण ऋषि के रूप में प्रकट हुए थे और बाद में उन्होंने बदरिकाश्रम में तप किया था। वे ही श्रीनरनारायण ऋषि इस कलियुग में पाखंडियों के मत का खंडन करने, अधर्म के वंश का नाश करने, धर्म के वंश को पुष्ट करने तथा पृथ्वी पर धर्म, ज्ञान, वैराग्य सहित भक्ति का विस्तार करने के लिए धर्मदेव एवं भक्तिदेवी द्वारा नारायणमुनि रूप से प्रकट होकर इस सभा में विराजमान हैं।”

ऐसा कहकर उन्होंने अपने आश्रितजनों को अतीव आनन्दमग्न कर दिया।

श्रीजीमहाराज पुनः बोले कि, “हम बार-बार श्रीनरनारायणदेव की प्रधानता बताते हैं, इसका अभिप्राय तो यही है कि श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम अक्षरधाम के धामी श्रीनरनारायण ही इस सभा में नित्य विराजमान रहते हैं। इसलिए, हम उनका महत्त्व प्रतिपादित करते रहते हैं। हमने अपने इस स्वरूप को दृष्टिगत रखते हुए श्री अहमदाबाद में लाखों रुपये खर्च करके शिखरबद्ध मन्दिर स्थापित किया है, और उसमें सर्वप्रथम श्रीनरनारायण की मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित कीं। वे श्रीनरनारायण अनन्त ब्रह्मांडों के अधिपति हैं, उनमें भी इस भरतखंड के वे मुख्यरूप से अधिपति हैं। इस भरतखंड के मनुष्य प्रत्यक्ष श्रीनरनारायण को छोड़कर अन्य देवों का भजन करते रहते हैं, इन मनुष्यों की तुलना तो उन व्यभिचारिणी स्त्रियों के साथ की जा सकती है। जो अपने पतियों को छोड़कर अन्य व्यभिचारी पुरुषों के प्रति आकृष्ट हो जाती हैं। श्रीनरनारायण ही भरतखंड के अधिपति हैं। इसका उल्लेख श्रीमद्भागवत में किया गया है। हम सन्तसहित जीवों के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। अतएव, यदि आप हमारे वचनों को मानेंगे, तो हम आप सबको भी उस धाम में ले जाएँगे, जहाँ से हम आए हैं। आपको भी ऐसा समझ लेना कि आपका कल्याण हो चुका है। आप मुझमें दृढ़ विश्वास बनाये रखें और हम जैसा कहें वैसा करते रहें। यदि आप पर कोई भारी कष्ट आ पड़ेगा, तो उससे अथवा सात दुर्भिक्षों-जैसी भीषण विपत्तियों से भी हम आपकी रक्षा करेंगे। हम आपकी ऐसे कष्ट से भी रक्षा करेंगे, जिससे उबरने का कोई उपाय न सूझता हो। लेकिन, शर्त यह है कि आप हमारे सत्संग के धर्म एवं नियमों का अधिकाधिक पालन करते रहें और सत्संग में टिके रहें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो आप भीषण दुःखों के फन्दे में फँस जाएँगे, जिसमें हमें कुछ लेनादेना नहीं है। हमने तो इस समय किसी भी बात की न्यूनता नहीं रखी है। देखो न! इस जेतलपुर ग्राम में हमने कितने यज्ञ किए हैं और कितने ही वर्षों से यहाँ रहते हैं, तालाब में हमने समस्त सन्तों के सहित हज़ारों बार स्नान किया है तथा इस जेतलपुर ग्राम के घर-घर में सौ बार फिरे हैं। और घर-घर जाकर भोजन भी किया है। इस ग्राम की सीमा और ग्राम को हमने वृन्दावन से भी बढ़कर रमणीय स्थल बना दिया है।”

जब महाराज ऐसी बात कर ही रहे थे कि इतने में आकाश में एक विशाल तेजपुँज दिखायी पड़ा और उसमें से तीन गोले हो गए, जो प्रासाद ऊपर थोड़ी देर तक दिखायी पड़े, फिर वहाँ से अदृश्य हो गए।

तब सब भक्तों ने कहा, “हे महाराज! यह क्या था?”

तब श्रीजीमहाराज ने बताया कि, “ब्रह्मा, विष्णु, एवं शिव प्रतिदिन इन सन्तों की सभा तथा हमारे दर्शन करने आते रहते हैं, परन्तु, आज हरि-इच्छा से ये तीनों देव अपने विमानों सहित आप सबके लिए दिखाई दिए।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ ५ ॥ २७४ ॥

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This Vachanamrut took place ago.


३०४. नरनारायण की ही महिमा जाननेवाले गुणभाविक भक्तों के लिए उनकी श्रद्धा बनी रहे, इस हेतु से श्रीहरि यहाँ अपने को नरनारायण स्वरूप से निरूपित करते हैं।

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