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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा प्रथम ४३

चार प्रकार की मुक्ति

संवत् १८७६ में माघ शुक्ला सप्तमी (२२ जनवरी, १८२०) को सायंकाल श्रीजीमहाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन में पूर्वी द्वार के कमरे के बरामदे में पलंग पर विराजमान थे। उन्होंने मस्तक पर श्वेत पगड़ी बाँधी थी, सफ़ेद चादर ओढ़ी थी और श्वेत धोती धारण की थी। और पाग में पीले पुष्पों के तुर्रे लटकते थे। उन्होंने कंठ में पीले पुष्पों के हार पहने थे तथा दोनों कानों पर पीले पुष्पों के गुच्छ खोंसे थे। उनके मुखारविन्द के समक्ष सभा में साधु-संत तथा स्थान-स्थान के हरिभक्त बैठे थे।

उस समय श्रीजीमहाराज समस्त भक्तजनों को करुणा-दृष्टि से देखकर बोले, “सब सुनिए, एक प्रश्न पूछते हैं कि श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है कि, ‘भगवान के भक्त होते हैं, वे चार प्रकार की मुक्ति के इच्छुक नहीं होते।’ भगवान के अन्य बड़े भक्त भी ऐसा ही कहते हैं कि, ‘भगवद्भक्त चार प्रकार की मुक्ति को नहीं चाहते।’ वह चार प्रकार की मुक्ति क्या है? तो सुनिये, इनमें से पहली तो यह है कि भगवान के लोक में रहना (सालोक्य), दूसरी भगवान के सान्निध्य में रहना (सामीप्य), तीसरी भगवान के समान रूप प्राप्त करना (सारूप्य) और चौथी मुक्ति भगवान के सदृश ऐश्वर्य को प्राप्त करना (साधर्म्य) है। चार प्रकार की ऐसी जो मुक्ति हैं, उसे भगवान का भक्त नहीं चाहता, वह तो केवल भगवान की सेवा का ही इच्छुक रहता है। अब प्रश्न यह है कि वह भक्त चार प्रकार की मुक्ति को क्यों नहीं चाहता? इस प्रश्न का उत्तर जिसको जैसे आए वैसा दो।”

तब समस्त परमहंस उत्तर देने लगे, किन्तु यथार्थ उत्तर न दे सके।

फिर श्रीजीमहाराज बोले कि, “इस प्रश्न का उत्तर हम देते हैं और वह यह है कि भगवान का भक्त होकर भी जो पुरुष चार प्रकार की मुक्ति की इच्छा रखता है, वह सकाम भक्त कहलाता है। और, जो भक्त इस चतुर्धा मुक्ति को नहीं चाहता, किन्तु एकमात्र भगवान की सेवा का ही इच्छुक रहता है, वह निष्काम भक्त कहा जाता है। इसका वर्णन श्रीमद्भागवत में इस प्रकार किया गया है –

‘मत्सेवया प्रतीतं च सालोक्यादि चतुष्टयम्।
नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत्कालविप्लुतम् ॥६९
सालोक्यसार्ष्टि सामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥७०

“इन श्लोकों का अर्थ यह है कि भगवान का निष्काम भक्त उस चतुर्धा मुक्ति की भी इच्छा नहीं करता, जिसमें भगवान की सेवा या परिचर्या न हो। वह तो वस्तुतः केवल सेवा का ही इच्छुक रहता है। ऐसे निष्काम भक्त को भगवान अपनी सेवा में रखते हैं और भक्त की अनिच्छा होने पर भी भगवान बलपूर्वक उसे अपने ऐश्वर्य-सुख प्राप्त कराते हैं। इस सम्बंध में कपिलदेव भगवान ने कहा है:

‘अथो विभूतिं मम मायाविनस्ताम् ऐश्वर्यमष्टांगमनुप्रवृत्तम्।
श्रियं भागवतीं वा स्पृहयन्ति भद्रां परस्य मे तेऽश्नुवते तु लोके ॥७१

“भगवान ने ऐसे निष्काम भक्तों को ही गीता में ज्ञानी कहा है। जो सकाम भक्त हैं, उन्हें अर्थार्थी बताया है। इसीलिए, भगवान के भक्त को भगवान की सेवा के सिवा अन्य किसी की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए। यदि वह इच्छा करे, तो उसमें इतनी कचाई कही जाएगी। और, यदि ऐसी कचाई हो, तो उसने भगवान के निष्कामी तथा एकान्तिक भक्त का सत्संग करके उस कमी को समाप्त कर देना!”

॥ इति वचनामृतम् ॥ ४३ ॥

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This Vachanamrut took place ago.


६९. मेरी सेवा से प्राप्त होनेवाली सालोक्यादि चतुर्विध मुक्ति को मेरी सेवा से ही परिपूर्ण हुए निष्काम भक्त नहीं चाहते, तब वे फिर काल द्वारा नष्ट होनेवाले देवताओं के ऐश्वर्यों को प्राप्त करने की इच्छा न करें, उसके सम्बंध में क्या कहना? (श्रीमद्भागवत: ९/४/६७)

७०. अर्थ: मेरी सेवा के सिवा भगवान द्वारा बलपूर्वक प्रदत्त सालोक्यादि मुक्ति को भी जब निर्गुण भक्तिवाले ग्रहण नहीं करते, तब फिर वे सांसारिक फल की इच्छा न करें, उसके सम्बंध में क्या कहना? (श्रीमद्भागवत: ३/२९/१३) आत्यंतिक मुक्ति में चार भेद नहीं है। भगवान स्वामिनारायण ने आत्यंतिक मुक्ति का लक्षण इस प्रकार कहा है: तत्र ब्रह्मात्मना कृष्णसेवामुक्तिश्च गम्यताम्। (शिक्षापत्री १२१) अर्थात् “अक्षरधाम को प्राप्त अक्षरमुक्त अक्षरब्रह्म के साधर्म्य को प्राप्त होता है।” (वचनामृत गढ़डा प्रथम २१) इस प्रकार उन्होंने ‘ब्रह्मरूप होकर परब्रह्म की सेवा’ को ही मुक्ति के रूप में स्वीकार किया है।

७१. अर्थ: अर्चिरादिमार्ग में जाना आरम्भ होने के बाद मेरे निष्काम भक्त मेरी - योगमाया के स्वामी की प्रसिद्ध विभूति को, ब्रह्मलोक तक की सम्पत्ति, भक्तियोग से प्राप्त होनेवाले अणिमादि आठ प्रकार के ऐश्वर्यों को तथा वैकुंठादि दिव्य-लोकों में रहनेवाली सम्पत्ति को, अर्थात् मंगलरूप भागवती श्री को प्राप्त करना नहीं चाहते। फिर भी सबसे परे मेरे धाम में जाकर वे उन्हें प्राप्त करते हैं। यदि मेरे ये भक्त ‘भागवती श्री’ तक को नहीं चाहते हैं, तो वे माया-विभूति आदि की इच्छा न करें, इसमें कहना ही क्या है? (श्रीमद्भागवत: ३/२५/३७)

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