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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा प्रथम ५४

भागवतधर्म का पोषण और मोक्ष का द्वार

संवत् १८७६ में माघ कृष्णा एकादशी (१० फरवरी, १८२०) को स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन में श्रीवासुदेव नारायण के मन्दिर के आगे पश्चिमी द्वार के कमरे के बरामदे में पलंग पर गद्दी-तकिया रखवाकर विराजमान थे। उन्होंने श्वेत धोती धारण की थी, जरी के पल्लेवाला नीले रंग का ‘रेटा’ ओढ़ा था और आसमानी रंग का जरीदार रेशमी फेंटा सिर पर बाँधा था। उनके मुखारविन्द के समक्ष सभा में संतवृंद तथा स्थान-स्थान के हरिभक्त बैठे हुए थे।

उस समय मुक्तानन्द स्वामी ने प्रश्न पूछा कि, “हे महाराज! श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में जनकराजा तथा नव योगेश्वर के संवाद द्वारा बताए गए भागवतधर्म का पोषण कैसे होता है और जीव के लिए मोक्ष का द्वार किस प्रकार खुला रह सकता है?”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “स्वधर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा माहात्म्यज्ञान सहित भगवद्भक्ति करनेवाले भगवान के एकान्तिक साधु के सत्संग से भागवतधर्म का पोषण होता है तथा ऐसे साधु के प्रसंग (अत्यंत आत्मबुद्धि-प्रीति) से ही जीवों के लिए मोक्ष का द्वार भी खुल जाता है। यही बात कपिलदेव भगवान ने देवहूति से कही है:

‘प्रसंगमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः।
स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम् ॥८०

“इस जीव को अपने सम्बंधीजनों से जैसा दृढ़ प्रसंग (लगाव) रहता है, वैसा का वैसा ही लगाव यदि भगवान के एकान्तिक साधु से रहे, तो इस जीव के लिए मोक्ष का द्वारा खुल जाता है।”

फिर शुकमुनि ने पूछा, “चाहे कैसी भी आपत्ति आ जाए, किन्तु स्वधर्म से विचलित न होनेवाले पुरुष को किस लक्षण द्वारा परखा जा सकता है?”

श्रीजीमहाराज बोले, “जिसे परमेश्वर के वचनों के पालन की तत्परता रहती है तथा छोटे-बड़े वचन का लोप न कर सके, ऐसा जिसका स्वभाव होता है, उसे चाहे कैसा ही आपातकाल आ जाए, तो भी वह धर्म से च्युत नहीं होता। इसीलिए, जिसमें वचनपालन की दृढ़ता रहती है, उसका ही धर्म सुदृढ़ रहता है, तथा सत्संग भी उसी का सुदृढ़ रहता है।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ ५४ ॥

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८०. श्रीमद्भागवत: ३/२५/२०

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