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॥ श्री स्वामिनारायणो विजयते ॥

परब्रह्म पुरुषोत्तम

भगवान श्रीस्वामिनारायण के

॥ वचनामृत ॥

गढ़डा प्रथम ५८

देह, कुसंग और पूर्व संस्कार

संवत् १८७६ में फाल्गुन शुक्ला पंचमी (१८ फरवरी, १८२०) को संध्याकालीन आरती के समय स्वामी श्रीसहजानन्दजी महाराज श्रीगढ़डा-स्थित दादाखाचर के राजभवन में परमहंसों के स्थान पर विराजमान थे। उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किए थे। उनके मुखारविन्द के समक्ष सभा में स्थान-स्थान से आए हरिभक्त बैठे हुए थे।

उस समय श्रीजीमहाराज बोले कि, “प्रश्न पूछिये।”

तब मुक्तानन्द स्वामी ने प्रश्न किया, “हे महाराज! भजन-स्मरण करते समय भगवान के भक्त के हृदय में रजोगुण तथा तमोगुण का वेग उत्पन्न होता है, तब भजन एवं स्मरण का सुख प्राप्त नहीं होता। अतः कृपया बताइए कि इन गुणों का वेग कैसे मिट सकता है?”

इस प्रश्न के उत्तर में श्रीजीमहाराज बोले कि, “इन (मायिक) गुणों की प्रवृत्ति के कारण देह (देहात्मबुद्धि), कुसंग तथा पूर्वसंस्कार, ये तीन हैं। उनमें देह के योग से जो गुण प्रवर्तमान रहते हों, वे आत्मा-अनात्मा के विचार द्वारा मिट जाते हैं। और, जो कुसंग द्वारा प्रवृत्त हुए हो, वह सन्त के संगत से दूर हो जाते है। किन्तु रजोगुण-तमोगुण के जो वेग उपरोक्त दोनों साधनों के द्वारा भी नहीं टलते, वे पूर्वजन्म के किसी अशुभ संस्कार के योग के कारण ही नहीं टलते, उनका टलना अत्यन्त कठिन होता है।”

फिर आनन्दानन्द स्वामी ने पूछा, “यदि पूर्वजन्म के संस्कार मलिन हों, तो वे कैसे टल सकते हैं?”

तब श्रीजीमहाराज बोले, “जिस पर अतिशय महान सत्पुरुष की प्रसन्नता हो जाए, उसके चाहे जितने भी मलिन संस्कार हों, वे भी नष्ट हो जाते हैं और उनके प्रसन्न होने से रंक भी राजा हो जाता है। इसके साथ ही चाहे जितने अनिष्टकारी प्रारब्ध हों, वे सब शुभ हो जाते हैं और उसके सिर पर चाहे जितना बड़ा विघ्न उपस्थित होनेवाला हो, वह नष्ट हो जाता है।”

इस उत्तर पर आनन्दानन्द स्वामी ने पुनः पूछा, “कौन-सा उपाय करने से ऐसे महान सन्त प्रसन्न होते हैं?”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “सबसे पहली बात यह है कि महान संत के प्रति निष्कपटभाव से व्यवहार करे तथा उसके पश्चात् काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, आशा, तृष्णा, अहंकार और ईर्ष्या आदि का त्याग करें, तथा सन्त का गुलाम होकर रहे। और, अन्तःकरण में मान की भावना रहने पर भी दैहिक रूप से सबके प्रति विनम्र भाव से रहे, तो उस भक्त पर महान सन्त प्रसन्न होते हैं!”

इसके बाद महानुभावानन्द स्वामी ने पूछा कि, “हे महाराज! सत्संग में रहते हुए समस्त अवगुणों का नाश हो जाए और भगवान की भक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती रहे, इसका क्या उपाय है?”

तब श्रीजीमहाराज बोले कि, “जो भक्त महापुरुष का गुण जैसे-जैसे ग्रहण करता जाता है, वैसे-वैसे उसकी भक्ति में वृद्धि होती जाती है। और, अति महान संत को अत्यन्त निष्कामी समझ लें, तो स्वयं भले ही कुत्ता जैसा कामी हो, फिर भी वह निष्कामी बन जाता है। और यदि महापुरुष में कामुकता का दोष सोचनेवाला मनुष्य चाहे जितना भी निष्कामी हो, फिर भी वह घोर कामी हो जाता है। और, महान संत में क्रोध एवं लोभवृत्ति की कल्पना करनेवाला स्वयं क्रोधी और लोभी हो जाता है। और, यदि महान सन्त को अतिशय निष्कामी, निर्लोभी, निःस्वादी, निर्मानी और निःस्नेही समझे, तो वह भी इन समस्त विकारों से मुक्त हो जाता है, और दृढ़ हरिभक्त बन जाता है। ऐसे दृढ़ हरिभक्त का क्या पहचान है? तो जिसे अच्छे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक पाँच विषयों के प्रति उसी प्रकार अरुचि हो, जैसे कोई दुःखदायी चीज़ के प्रति अरुचि रहती है, और एकमात्र परमेश्वर के स्वरूप में ही जिसकी अचल निष्ठा रहती हो, उसी को दृढ़ हरिभक्त जानना। ऐसा दृढ़ हरिभक्त होने का केवल यही उपाय है कि परमेश्वर के दास का गुलाम होकर रहे, और यह समझे कि ये समस्त भक्त बड़े हैं और मैं सबसे न्यून हूँ। ऐसा जानकर वह हरिभक्त का दासानुदास होकर रहे। और, जो पुरुष इस प्रकार रहता है, उसके समस्त विकारों का विनाश हो जाता है और दिन-प्रतिदिन उसके ज्ञान, वैराग्य, भक्ति आदि शुभ गुण बढ़ते रहते हैं।”

॥ इति वचनामृतम् ॥ ५८ ॥

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